सहकारकर्मियों को सीना तान के चलना चाहिए : हरिभाऊ बागडे

महाराष्ट्र, औरंगाबाद : सहकार भारती –  देवगिरी सम्भाग तथा सहकार सुगंध द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष श्री हरिभाऊ बागडेजी ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए- ‘सहकार क्षेत्र में डरकर नहीं, बल्कि सीना तानकर चलना चाहिए।’ आगे उन्होंने कहा, सहकारिताओं के गलत व्यवहारों पर काबू पाने के लिए सरकार ने नया निर्णय लिया है, जिसके कारण सहकार क्षेत्र और भी अधिक मजबूत हो जाएगा।

सिडको स्थित जगद्गुरु तुकाराम महाराज नाट्यगृह में सहकार भारती स्थापना दिवस तथा सहकार सुगंध द्वारा आयोजित ‘प्रतिबिंब’ वार्षिक अहवाल प्रतियोगिता पुरस्कार समारोह बडी धूमधाम से संपन्न हुआ। इस समारोह में राज्य साखसंस्था फेडरेशन अध्यक्ष ओमप्रकाश कोयटे, सहकार भारती प्रदेश अध्यक्ष संजय बिर्ला, राष्ट्रीय महिला प्रमुख संध्याताई कुलकर्णी, केंद्रीय पदाधिकारी आबासाहब देशपांडे, देवगिरी सम्भाग अध्यक्ष प्रभाकर देशमुख, संगठनमंत्री कमलाकर हट्टेकर, सहकार संगम आयोजक डॉ. शांतीलाल सिंगी, शहर अध्यक्ष बबनराव जगाडे, देवगिरी नागरी सह. बैंक उपाध्यक्ष तथा कार्यक्रम स्वागताध्यक्ष किशोर शितोळे, सहकार सुगंध मासिक पत्रिका के संपादक भालचंद्र कुलकर्णी आदि मान्यवर व्यासपीठ पर उपस्थित थे।

अपने सहकार विषयक विचार व्यक्त करते हुए श्री हरिभाऊ बागडे जी ने आगे कहा, समूचे देश में सहकार क्षेत्र व्यापक है। सहकार क्षेत्र को उचित ढंग से प्रकट होना चाहिए। अनेकों सहकारिताओं का कामकाज अच्छा चल रहा है। फिर भी जरा कुछ गलत हुआ नहीं, कि सहकार क्षेत्र बदनाम होता है। उसकी वजह से समाज का नजरिया बदल जाता है। ऐसी गलतियाँ ना हो इसलिए सहकार भारती ने कुछ ठोस कदम भी उठायें हैं, जो कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। समस्याएँ जरूर है, लेकिन उन्हें सुलझाने के लिए प्रयास होना जरुरी है। इस के लिए आप सब का योगदान अपेक्षित है। जरूरत है सहकार क्षेत्र के मजबूतीकरण की, इस क्षेत्र में पारदर्शिता की, अगर कुछ गलत हुआ तो प्रामाणिकता से वह गलती कबूल करने की मानसिकता अगर आप रखते हो, तो ही सहकार क्षेत्र आगे बढेगा। एक बार हुई गलती दोबारा ना हो यह भी बागडे जी ने जताया।

अगर आपकी संस्था का व्यवहार स्वच्छ तथा पारदर्शी हो, तो आपको ऑडिटर को डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं। अपना सीना तानकर आए संकटों का मुकाबला करना चाहिए। चाहे कितनी भी तकलीफ हो, गलत व्यवहार न करें। आज साखसंस्था, सहकारी बैंकों के सामने कुछ कठिनाईयाँ जरूर है, कुछ संस्थाएँ अपना कारोबार बंद करने की स्थिति में हैं। लेकिन उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सहकार भारती ने ज्यादातर प्रयास करने के विचार पर बागडे जी ने जोर दिया। सहकार भारती को चाहिए कि कार्यकर्ताओं की संख्या तथा उनका योगदान बढ जाए। कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देने के लिए सहकार भारती द्वारा व्यापक कार्य आवश्यक है, ऐसा भी उन्होंने प्रतिपादित किया।

सहकारी संस्थाओं को चाहिए कि वे उनके खातेदारों के डिपोजिट को सुरक्षा प्रदान करें तथा कर्जवसुली पर ज्यादा ध्यान दें। आगे उन्होंने कहा, नियम 101 की कार्रवाई का विषय विधानसभा में विचाराधीन है। आम आदमी अपनी पूँजी सहकार संस्था में उस संस्थापर विश्‍वास रखते हुए ही जमा करता है। उसके इस विश्‍वास को सार्थ करना चाहिए। एनपीए रेशो नियंत्रण में रखना, उनके हेतु नियम में बदलाव करने के लिए आग्रह, सबका एकीकरण, सहकार क्षेत्र का पुनरुज्जीवन, गलत व्यवहार पर नियंत्रण आदि तथ्यों पर उन्होंने अपने मौलिक विचार व्यक्त किए।

दीपप्रज्वलन के बाद सहकार सुगंध, जलगाँव के ज्येष्ठ प्रतिनिधी विश्‍वासराव कुलकर्णी द्वारा सहकार गीत गायन हुआ। अतिथियों का स्वागत किशोर शितोळे इन्होंने किया। इस समय उन्होंने सहकार संगम कार्यक्रम की जानकारी प्रस्तुत की। देवगिरी सम्भाग अध्यक्ष प्रभाकर देशमुख ने प्रास्ताविक किया। सहकार सुगंध मासिक पत्र द्वारा सहकार सुगंध पत्रिका का विमोचन इस समय प्रमुख अतिथि के करकमलों द्वारा हुआ। सहकार क्षेत्र ज्येष्ठ कार्यकर्ता दिलीप धारूरकर जी को बागडे जी द्वारा सम्मानित किया गया। हाल ही में उनकी नियुक्ती माहिती आयुक्त के पद पर हुई हैं। धारूरकर जी का यह सम्मान उनकी ऊुपस्थिति में उनकी पत्नी संगीता धारूरकरने स्वीकृत किया।

सहकार सुगंध सम्पादक भालचंद्र कुलकर्णी ने अहवाल प्रतियोगिता के बारे में जानकारी दी। पिछले पाँच वर्षों से यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रहीं है।

तथोपरान्त प्रतिबिंब अहवाल प्रतियोगिता पुरस्कार समारोह संपन्न हुआ। वृत्तसंपादक विनायक कुलकर्णी इन्होंने सूत्रसंचालन किया। आभार प्रदर्शन डॉ. शांतीलाल सिंगी इन्होंने किया।

सहकार क्षेत्र की ओर से अनोखे उपक्रम की सराहना।

सहकार संगम कार्यक्रम में इस वर्ष एक अनोखापन नजर आया, जिसका सब ने तहेदिल से स्वागत किया। इस वर्ष सहकार क्षेत्र पर आधारित विभिन्न विषयोंपर व्याख्यानमाला आयोजित की गई, जिसमें सहकारिता के पंजीकरण के साथ संस्था कार्यालय की वस्तुरचना, आधुनिक यंत्रणा का उपयोग, सॉफ्टवेअर्स, अन्य उत्पादन, सहकारिताओं पर बजट की छाप, सहकारिताओंके समक्ष आव्हान, तथा महाभारत काल में भी सहकार किस तरह पनपा- आदि विषयोंपर आधारित व्याख्यानों का समावेश था।