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श्रद्धेय लक्ष्मणराव इनामदार जन्मशती समारोह दिल्ली में, सहकार भारती अध्यक्ष मा. ज्योतिंद्रभाई मेहता जी ने किया हुआ भाषण।

भारतवर्ष कभी विश्वगुरु हुआ करता था I आज फिर से वः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है I ऐसे हमारे भारतवर्ष के प्रधानमंत्री परम आदरणीय श्री नरेंद्रभाई मोदी जी, कृषिप्रधान देश भारत के कृषिमंत्री आदरणीय श्री राधा मोहन जी,

देश के कोने कोने से पधारे मेरे सहकारी कार्यकर्ता भाइयों एवं बहनों, आज के इस पावन अवसर को गरिमा प्रदान करने को विशेष रूप से उपस्थित इनामदार परिवार के सदस्य,

श्रद्धेय श्री लक्ष्मणराव इनामदार जी को अपने श्रद्धासुमन समर्पित करने को आज यहाँ पर सरकार और सहकार का समन्वय हुआ है I सहकार में संस्कार का स्वीकार करने वाले सहकार महर्षि दिवंगत लक्ष्मणराव जी इनामदार को हम सब अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे I

आज 21 सितंबर 2017 श्री लक्ष्मणराव जी इनामदार की जन्मशती का पुण्य दिवस I उनका पावन स्मरण करते हुए उनके द्वारा दिये गये विचारों को आत्मसात करने का और आने वाली पीढ़ियों को एक चिरस्थायी विरासत देने का सुअवसर I

लक्ष्मणराव जी का जन्म आज से ठीक सौ वर्ष पूर्व अर्थात 21 सितंबर 1917 के दिन हुआ I भारतीय पंचांग अनुसार वह रिषी पंचमी का दिन था I होनहार बिरवान के होत चिकने पात उक्ति के अनुसार वकीलसाहब रिषी पंचमी के दिन पैदा होने कारण ज्ञान और शिक्षा के धनी  बने I सुभग समन्वय देखिये, अंग्रेजी तिथि २१ सितंबर को संयुक्त राष्ट्रसंघ के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के रूप में मनाया जाता है I लक्ष्मणराव जी का जीवन इन दोनों गुणों ज्ञान और शांति से सराबोर था I उनमें ज्ञान और शांति का अनूठा समन्वय था I

युवावस्था से ही लक्ष्मणराव जी तपस्वियों की ऐसी परंपरा से जुड़ गये, जिन्होंने राष्ट्र की उन्नति के लिए अपना जीवन व संसार समर्पित कर   दिया I राष्ट्रभक्ति से रंगे हुए लक्ष्मणराव जी ने अपना घर छोड़ा, परिवार नहीं बसाया I उसी धून में पूर्णकालीन राष्ट्रवादी परंपरा के कार्य के लिए जीवन भर के लिए उन्होंने आजीवन राष्ट्र और समाजसेवा का प्रण लिया I वे कहते थे कि हम पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं I आवश्यकता पड़ने पर हम बारबार जन्म लेंगे और हर बार भारतमाता की सेवा के लिये अपना समस्त जीवन समर्पित कर देंगे I इन तपस्वियों का एक ही समर्पण गान था, तेरा वैभव अमर रहे, हम दिन चार रहें ना रहें I

उनका जीवनदर्शन बहुत ही सीधासादा था I एक संस्कृत सुभाषित में निहित उदात्त भावना इस प्रकार हैI

हे प्रभु! मुझे राज्य की कामना नही, स्वर्ग-सुख की चाहना नही तथा मुक्ति की भी इच्छा नही। एकमात्र इच्छा यही है कि दुख से संतप्त प्राणियों का कष्ट समाप्त हो जाये।

इस संस्कृत सूक्ति के अनुसार उनके जीवन में किसी प्रकार की न तो कामना रही, न कोई चाहत I वे सही मायनों में स्वयंसेवक रहे I स्वयं आगे आये सेवा करने के लिये, और आजीवन समाज के पिछड़े स्तर के लोगों की सेवा की और अन्य स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया I

इनामदार परिवार की खासियत भी कितनी उम्दा थी I लक्ष्मणराव जी के कुल मिला कर आठ भाई थे I सभी उन दिनों में highly qualified थे I आठ भाई और दो बहनों के परिवार में से तीन भाई लक्ष्मणराव जी, तात्याजी और किशनराव जी राष्ट्रसेवा को समर्पित हो कर प्रचारक बन कर निकल पड़े I घर और संसारी जीवन का स्वेच्छा से त्याग करते हुए वे आजीवन राष्ट्र और समाजसेवा में समर्पित रहे I वे सभी चाहते तो अपने क्वोलिफिकेशन और ज्ञान के आधार पर अपने व परिवार के लिए अच्छी खासी कमाई कर सकते थे I लेकिन उन सभीने समाज एवं राष्ट्र के लिए कार्य करना पसंद किया I लक्ष्मणराव इनामदार न केवल इमानदार थे, बल्कि परख्दर भी थे I वे गुणीजनों के परखदार यानी पारखी भी थे I ऐसे संभावित गुणी कार्यकर्ताओं का चयन करने के पश्चात् वे उनका निर्माण भी बहुत अच्छे तरीके से करते थे I वे कथनी से ज़्यादा करनी में विश्वास करते थे I

गुरु-शिष्य की प्राचीन भारतीय परंपरा से हम सबी वाकिफ हैं, जहां पर गुरु अपने ज्ञान का शक्तिपात शिष्यों में किया करते थे I आचार्य चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त, समर्थ स्वामी रामदास और छत्रपति शिवाजी, रामक्रीष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद इस परंपरा के वाहक थे I इसी परंपरा को वकीलसाहब ने आगे बढाया I उनके समर्थ शिष्यों की आकाशगंगा में एक देदीप्यमान सितारा है, हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्रभाई मोदी I हमें गर्व है इस बात पर I

वकीलसाहब ने  कार्यकर्ताओं के निर्माण के साथसाथ कोंसेप्ट को स्पष्ट करने पर भी जोर दिया I वे सदैव चिंतित रहते थे कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बहुत बड़ी है, उसे पाटने पर ध्यान दिया जाना चाहिये, जिसके लिये सहकारिता बहुत बड़ा और कारगर साधन साबित होगा I आर्थिक पैमाने के हिसाब से भारत की आबादी तीन विभाग में विभाजित की जा सकती है I गरीब, मध्यम वर्ग और  अमीर I गरीब और माध्यम वर्ग के लोग,  के उत्कर्ष के लिये को-ओपेरटिव की आवश्यकता है I

cooperative का विकास भारत के प्रत्येक प्रदेश में समान रूप से नहीं हो पाया है I इस लिए भारतीय अर्थतंत्र में सहकारिता के विकास के हिसाब से भारत के राज्यों को तीन विभागों में बांटा जा सकता हैं I

  1. Cooperatively Developed States,
  2. Cooperatively Developing States
  3. Cooperatively Undeveloped States

सहकारी संस्थाओं को जहाँ अधिक बढ़ावा मिलता है, सहकारिता गतिविधि जहाँ पर अधिक पनपी है, वहां पर सहकारिता और वह जिनका प्रतिनिधित्व करती है, ऐसे मध्यम वर्ग और निचले तबके के लोगों का विकास अधिक होता है I Cooperatively Developed states में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का समावेश होता है I

आप पायेंगे की इसके परिणामस्वरुप उक्त राज्य की GDP में वृद्धि होती है और गरीब व मध्यम वर्ग का सशक्तिकरण होता है I क्योंकि सहकारिता के कारण संपत्ति का सर्जन होता है, वह संपत्ति बृहद समाज की होती है I अत: हम कह सकते हैं कि Cooperative is a Social Capital.

इस सामाजिक पूँजी की सुरक्षा और मज़बूती के लिये प्रत्येक राज्य की अपनी स्थानीय स्थिति के आधार पर सहकारी नीति गठित होनी चाहिए I साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी एक कारगर और सहकारिता के चिरस्थायी मोडेल की प्रस्तुति हो ऐसी सहकारी नीति बने यह मेरा शासन को अनुरोध है I हम आर्थिक सहाय नहीं चाहते I हम विकास के लिये आवश्यक सपोर्ट की अपेक्षा करते हैं I

बांग्लादेश के मोहम्मद युनुस अमेरिका में अर्थशास्त्र पढ़ा रहे थे I 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए ढाका आये थे I बांग्लादेश की गरीब आबादी, जोकि झोंपड़पट्टी में रहती थी, उनकी गरीबी को करीब से देख कर उन्हें लगा कि अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के द्वारा लोगों की सुख-सुविधा बढाने के पाठ पढाना अलग बात है और उन्हीं को अमल में लाना एकदम अलग  बात है I लेकिन सहकारिता के सिद्धांतो के द्वारा उन्होंने Self Help Group और Joint Liability group के द्वारा बांग्लादेश की लाखों गरीब महिलाओं का आर्थिक और सामाजिक स्तर ऊपर उठाया I बांग्लादेश की महिलाओं की ग्रामीण बैंक बनायी, जो बहुत बड़े पैमाने पर बिझनेस कर रही है I

आर्थिक विकास और development के अनेक मोडेल की चर्चा पूरे विश्व में होती रही है I विश्व के हरेक देश को अपने समाज का आर्थिक और सामाजिक स्तर बढाने की अपनी अपनी system और थियरी बनी हुई है I

अर्थशास्त्रियों को constant growth और sustainable model की अत्यधिक चिंता रहती है I ऐसे प्रत्येक model का टेस्ट भी समय समय पर होता रहता है I और समयांतर के बाद उसका success ratio का पता चलता है I

सहकारिता के जोप प्रयोग हुए, उनका भी एसिड टेस्ट हो चुका है I 2008 के global meltdown  हुआ I यूरोप और अमेरिका की बड़ी बड़ी बैंकें और  सौ साल पुरानी बैंक ताश के पत्तों के महल की भांति गिरने लगी, तब यूरोप और अमेरिका के cooperative banking sector को छोटी सी खरोंच तक नहीं आई I

BRICS देशों में consumer / production / marketing और credits में कई सहकारी समितियां कार्यरत हैं I स्थिति यह है कि ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रिका अपने देश में सहकारिता का अच्छा model बनाने के लिए भारत की ओर देख रहे हैं I

भारत में उत्पादन या सेवा के सभी क्षेत्रों में सहकारिता ने कार्य किया है I छोटे छोटे self help group या joint liability group से ले कर बड़ी बड़ी सहकारिता से करोड़ों लोग जुड़े हैं I Banking/ Credit / dairies / consumer / production / marketing / fisheries / housing / agriculture / labour / weavers / construction / IT / hospital / school  और services in सभी सेक्टर में सहकारी लोग जुड़े हैं I “सहकार भारती”  सहकारिता के ऐसे अनेक model के साथ लोगों को उनके प्रकोष्ठ (cell) के माध्यम से कार्यरत है I

आगे मैंने युनुसजी की बात कही I उन्हीं की तरह भारत में याद किया जाता है कुरियन वर्गिस को I White Revolution के प्रणेता कुरियन जी अपने समय के डेयरी उद्योग के ध्रुव तारक थे I उनके विषय में तत्कालीन प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि ऐसे दस और कुरियन की हमारे देश को आवश्यकता है I उसके प्रत्युत्तर में कुरियन जी ने कहा था, झरूरत कुरियन की नहीं, त्रिभुवनभाई पटेल की है, जो कुरियन को ले आये I आगे उन्होंने यह भी कहा कि को-ओपरेटिव मोडेल को सफल बनाना हो तो सहकारी कार्यकर्ताओं में तीन गुणों की आवश्यकता है I सहकारी कार्यकर्ता principled, informed और committed होना चाहिये I सिद्धांतशील, जानकार और प्रतिबद्ध होना चाहिये I जो वकीलसाहब का भी चिंतन रहा I वकीलसाहब का ब्सर्वधिक महत्त्वपूर्ण सहकारी चिन्तन रहा, बिना संस्कार, नहीं, सहकार I

संस्कृत में एक बहुत ही अच्छी सूक्ति है, योजकः तत्र दुर्लभ: I काम करने वाले हझारों मिल जायेंगे, लेकिन, उनको काम में लाने वाले, एकत्र करने वाले, मार्गदर्शन और दिशानिर्देश देने वाले योजक हमेशा दुर्लभ होते हैं I वकीलसाहब ऐसे दुर्लभ और कुशल योजक थे I

उन्होंने जीवनभर पूरी तन्मयता से अपने स्वास्थ्य की बिना परवाह किये सहकारिता के लिए अथक कार्य किया और कार्यकर्ताओं को शिक्षित किया I दोनों छोर से जलने वाली मोमबत्ती की भाँति उनकी जीवनरेखा बहुत गति से खर्च होती रही और अपेक्षाकृत जल्दी ही उनकी जीवनज्योत बुझ गई I उनके जैसे संन्यासियों की एक ही धून रही,

मन मस्त फकीरी धारी है,

बीएस एक ही धून

जय जय भारत, जय जय भारत…

अखण्ड तपस्वी, श्रेष्ठ सुकानी, कुशल संगठक, रिषीतुल्य संस्कारपुरुष पूजनीय वकीलसाहब को शत सहस्र नमन, शत सहस्र नमन…

वन्दे मातरम,  भारत माता की जय I

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